जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की आहट, पीएम मोदी के साथ मीटिंग से पहले गुपकार गठबंधन बीच में पाकिस्तान को लेकर आया: Latest News

Jammu Kashmir Gupkar Alliance (1)

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद भारत से बाहर सबसे ज्यादा दुखी कौन है? आप इसका जवाब जरूर जानते होंगे- ये है पाकिस्तान. भारत की विदेश नीति बहुत साफ है कि आंतरिक मामलों में किसी दूसरे देश का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. लेकिन आज गुपकार संगठन में शामिल कश्मीरी राजनीतिक दलों की बैठक हुई तो उन्होंने पाकिस्तान का राग छेड़ दिया और कहा कि भारत को कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से भी बात करनी चाहिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिनों बाद जो बैठक बुलाई है, उसे लेकर आज नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया फारूक अब्दुल्ला के घर पर श्रीनगर में एक बैठक हुई. उसमें ये तय किया गया कि अनुच्छेद-370 को वापस लेने की मांग की जाएगी. इसी बैठक में ये भी कहा गया कि गुपकार से जुड़े राजनीतिक दल 35 (A) पर भी अपना हक मांगेंगे. आज इसीलिए देश गुपकार से कह रहा है कि इतना उपकार करो, ‘पाकिस्तान राग’ मत छेड़ो, अब 370 का नाम मत लो और 35 (A) को भी भूल जाओ.

दरअसल, 5 अगस्त 2019 के बाद पहली बार ऐसी कोई बैठक बुलाई गई है, जिसमें प्रधानमंत्री कश्मीर के अलग-अलग राजनीतिक दलों से बात करने वाले हैं. माना जा रहा है कि इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन और गुपकार संगठन के प्रवक्ता एमवाई तारीगामी समेत कश्मीर के 14 नेता शामिल होंगे.

चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री के साथ हो सकती है चर्चा

पिछले कुछ दिनों से कयास लगाए जा रहे हैं कि कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है. जाहिर है इस बैठक पर सबकी नजर है, लेकिन बैठक से पहले ही जो इरादे दिखाए गए, वो बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं. पाकिस्तान के साथ बातचीत की हिमायत करके महबूबा ने जता दिया कि जो बात दो दिनों के बाद होनी है, वो निकलेगी तो कितनी दूर तक जाएगी. नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला के आवास पर पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (PAGD) की जो बैठक हुई, उसमें ये फैसला तो हो गया कि दिल्ली आने का जो न्योता प्रधानमंत्री ने दिया है, वो कबूल है. लेकिन ये भी साफ हो गया कि बर्फ पिघलने की उम्मीद कम है.

दरअसल कहा ये जा रहा है कि 24 जून को होने वाली बैठक में जम्मू-कश्मीर में चुनाव को लेकर चर्चा हो सकती है और इसी चुनाव से डिलिमिटेशन का मसला भी जुड़ा हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त को कहा था कि जम्मू कश्मीर में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में डिलिमिटेशन की प्रक्रिया चल रही है. जल्दी से काम पूरा होते ही भविष्य में चुनाव हों, जम्मू के विधायक हों, मंत्री हों, मुख्यमंत्री हों, नई ऊर्जा के साथ विकास हो, इसके लिए देश प्रतिबद्ध भी है और प्रयासबद्ध भी.

डिलिमिटेशन या परिसीमन क्या है और इसकी जरूरत क्यों है?

परिसीमन का अर्थ होता है किसी विधानसभा या लोकसभा सीट की सीमाओं को दोबारा तय करना. ये काम परिसीमन आयोग करता है. जिसके आदेश को कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती है. परिसीमन का मकसद ये होता है कि अलग-अलग सीटों पर जनसंख्या का अनुपात संतुलित हो. जाहिर है, इस पूरे प्रोसेस में सीटों की संख्या पर असर हो सकता है. यहां आपके लिए ये जानना भी जरूरी है कि क्या इसके पहले कभी जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों का परिसीमन हुआ है?

1963, 1973 और 1995 में जम्मू-कश्मीर में परिसीमन हुआ था. आखिरी परिसीमन रिटायर्ड जस्टिस के के गुप्ता कमीशन ने किया था. तब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था. ये परिसीमन 1981 की जनगणना के आधार पर किया गया था. 1991 में राज्य में जनगणना नहीं हुई था. 2001 में जनगणना तो हुई लेकिन परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ, क्योंकि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कानून पास करके साल 2026 तक परिसीमन पर रोक लगा दी गई.

6 मार्च 2020 को नए परिसीमन आयोग का गठन

जिस सरकार ने परिसीमन पर रोक लगाई, वो नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार थी और इस रोक को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था. कुछ राजनीतिक दल ऐसा मानते हैं कि परिसीमन पर रोक लगने से जम्मू क्षेत्र के साथ अन्याय हुआ और अब ये माना जा रहा है कि परिसीमन के बाद जम्मू को फायदा होगा. राजनीतिक विश्लेषक सिब्ती मोहम्मद हसन का कहना है, “इसमें मुख्तलिफ तबके को नुमाइंदी देने की बात हुई है. कहा जा रहा है जम्मू में पाकिस्तान रिफ्यूजी है, उन्हें हिस्सेदार बनाया गया. गुज्जर शेड्यूल ट्राइब को भी शामिल किया या है. नई जनगणना के आधार पर किया गया है. ये भी कहा जा रहा है कि जम्मू प्रांत को ज्यादा ख्याल रखा गया है. सीटें बढ़ा दी गई हैं.”

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा वापस ले लिया गया. जिसके बाद 6 मार्च 2020 को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में नए परिसीमन आयोग का गठन कर दिया. आयोग को एक साल में अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन कोरोना की वजह से अब इसका कार्यकाल बढ़ा दिया गया है. बार-बार जिस परिसीमन की बात हो रही है, आखिर उससे घबराहट कैसी?

परिसीमन से क्या बदल जाएगा जम्मू-कश्मीर में?

पूर्ण राज्य के तौर पर जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में 87 विधान सभा सीटें थीं. इनमें 46 सीटें कश्मीर क्षेत्र की जबकि 37 सीटें जम्मू क्षेत्र की थीं. इसी तरह 4 सीटें लद्दाख की थीं, लद्दाख भी अलग केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है. आप लद्दाख की 4 सीटें हटा दें तो जम्मू-कश्मीर में 83 सीटें रह जाती हैं. कहा ये जा रहा है कि परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में कम से कम 7 सीटें बढ़ सकती हैं. यानी राज्य में कम से कम 90 विधानसभा सीटें हो जाएंगी.

माना जा रहा है कि जो नई आबादी परिसीमन में शामिल की जाएगी, वो ज्यादातर जम्मू की सीमा में आएगी. इसीलिए ये कहा जा रहा है कि परिसीमन से जम्मू की सीटें बढ़ सकती हैं. तो प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग में मुद्दा चाहे परिसीमन हो या चुनाव हो. इस बातचीत से पहले ही टकराव शुरू हो गया है.

कश्मीर के लोगों को पहले ये कहकर डराया जाता रहा कि आर्टिकल 370 हटा तो खून की नदियां बह जाएंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. कई बार ये कहकर भी धमकी दी गई कि भारत ने कार्रवाई की तो पाकिस्तान भी चुप नहीं बैठेगा, लेकिन पाकिस्तान खुद कश्मीर के मसले पर अलग-थलग पड़ गया. अब जबकि कश्मीर में एक नया दौर शुरू हो रहा है, अगर फिर से लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिशें होती हैं, तो ये फिक्र की बात है.

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