क्या किसान आंदोलन को अपराधियों ने कर लिया हाईजैक? शख्स को जलाकर मारने के बाद उठे कई अहम सवाल: Latest News

Farmers Tikri Border (1)

दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में शामिल कुछ लोगों पर आरोप लगा है कि उन्होंने एक व्यक्ति को जिंदा जला डाला है. मरने से पहले इस शख्स ने एक वीडियो में बताया कि उसे आग लगाने वालों ने कहा कि आंदोलन के लिए शहीद हो जाओ. जिसके बाद किसान आंदोलन पर फिर सवाल उठने लगे हैं. लेकिन यहां अहम सवाल ये है कि अगर ये सच्चाई सामने नहीं आती तो क्या होता? अगर मरने से पहले ये किसान बयान नहीं दे पाता तो क्या होता?

मरने से पहले मुकेश नाम के शख्स ने बताया था कि किसान आंदोलन के नाम पर जबरन उसे शहीद बनाने की कोशिश की गई. इस घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया है. सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस आंदोलन में किसान के भेष में कुछ हैवान भी शामिल हो गए हैं. दिल दहला देने वाली ये घटना हरियाणा के बहादुरगढ़ के पास टिकरी बॉर्डर की है. जहां करीब 7 महीने से किसान आंदोलन कर रहे हैं और सड़कों पर टैंट, तंबू गड़े हैं.

16 जून की शाम हरियाणा के बहादुरगढ़ के कसार गांव का रहने वाला मुकेश घर से घूमने निकला था और गांव के साथ ही पड़ाव डाले बैठे किसान आंदोलनकारियों के पास पहुंच गया. पुलिस में की गई शिकायत के मुताबिक, यहीं उसकी मुलाकात आरोपी कृष्ण और संदीप से हुई. मौके पर दो और लोग मौजूद थे. इसके बाद मुख्य आरोपी कृष्ण ने मुकेश को शराब पिलाई और फिर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी.

अस्पताल में मुकेश की हो गई मौत

दरअसल, 16 जून की रात गांव के सरपंच के पास घटनास्थल के नजदीक के पेट्रोल पंप के एक कर्मचारी ने फोन किया. जिसके बाद मुकेश के छोटे भाई और सरपंच मौके पर गए और 90 फीसदी झुलस चुके मुकेश को अस्पताल लेकर गए. इसी बीच मुकेश ने पूरी घटना सरपंच को बताई. इस घटना से मुकेश का परिवार और पूरा गांव सकते में है. मुकेश के परिवार में बूढ़े मां-बाप हैं. पत्नी और 10 साल की बिटिया है. इन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर मुकेश को किस गुनाह की सजा दी गई है.

बहादुरगढ़ पुलिस ने मुख्य आरोपी कृष्ण को गिरफ्तार कर लिया है और इस पूरे मामले को नशे की हालत में मारपीट का नतीजा बताया है. लेकिन परिवार और गांव के लोग इसे किसान आंदोलन में अराजक तत्वों की भीड़ का अंजाम बता रहे हैं और सरकार से अब इस आंदोलन को कहीं और शिफ्ट करने की मांग कर रहे है. इनका आरोप है कि आंदोलन में शामिल कुछ असामाजिक तत्व आए दिन लड़ाई झगड़ा करते हैं और गांव का माहौल खराब करते हैं.

सवाल ये कि किसानों के अधिकार की मांग पर बैठे आंदोलनकारियों के बीच अपराधियों को जगह किसने दी? सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या किसान आंदोलन अब किसान नेताओं के हाथ से निकल चुका है? भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता राकेश टिकैत कह रहे हैं कि मुकेश ने खुद कहा था कि मैं शहीद हो जाऊंगा. जबकि मरने से पहले मुकेश ने इकबालिया बयान दिया था कि आंदोलन में शहादत के लिए उसके शरीर में आग लगाई गई. लेकिन अब यहां उसकी मौत पर भी सियासत हो रही है, जो और भी शर्मनाक है.

कई और आपराधिक घटनाएं भी आई सामने

यहां एक सवाल और है कि अब मृतक किसान के परिवार का क्या होगा. हालांकि घर-परिवार के लोग उसकी पत्नी के लिए नौकरी और बच्चे के लिए पढ़ाई की मांग कर रहे हैं. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर इस घटना की सच्चाई सामने नहीं आती, तो क्या होता? क्या किसानों के भेष में उपद्रवी एक बार फिर अपने मकसद में कामयाब हो जाते? हालांकि किसान आंदोलन पर ऐसे सवाल पहली बार नहीं उठ रहे हैं. आंदोलनकारियों का चोला ओढ़े एजेंडा चलाने वालों ने पहले भी कई बार आग लगाने की कोशिशें की हैं.

26 जनवरी को आंदोलनकारियों के भेष में दिल्ली में हजारों हुड़दंगी घुसे. करीब 10 घंटे तक दिल्ली को बंधक बना लिया. पुलिसवालों को बुरी तरह मारा पीटा और लाल किले पर हुई हिंसा के दौरान दंगाईयों ने पुलिसकर्मियों पर ट्रैक्टर चढ़ाकर उन्हें मारने की कोशिश भी की और वो शर्मनाक तस्वीर पूरी दुनिया ने देखी. हालांकि उस वक्त भी किसान नेता ने इस हालात के लिए उल्टा पुलिस और सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया था और गलती मानने की बजाय उस शर्मनाक वाकये से भी आंदोलन को हवा देने की कोशिश की थी.

इससे पहले सिंघु बॉर्डर पर किसानों के मंच पर देशद्रोह का आरोप झेल रहे लोगों के पोस्टर भी लगे दिखे और उनकी रिहाई की मांग भी उठी. इसके अलावा खालिस्तान आतंकवादियों से भी इस आंदोलन का नाम जोड़ा गया और दुनिया के कई मुल्कों में भी भारतीय किसान आंदोलन के नाम पर एक अलग एजेंडे को धार देने की कोशिशें होती रहीं. उस बीच सवाल ये भी उठे थे कि क्या किसान आंदोलन हाईजैक हो गया है?

आंदोलन स्थल पर यौन शोषण का भी मामला

मई महीने में आंदोलन से जुड़ी जो खबर आई, वो और भी शर्मनाक थी. दिल्ली के टिकरी बॉर्डर स्थित किसानों के प्रदर्शन स्थल पर बंगाल से आई एक युवती की कोरोना से मौत हो गई थी. उसके बाद युवती के पिता ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनकी बेटी ने खुद फोन पर कहा था कि उसका शारीरिक शोषण किया गया था. इसके बाद एक नर्स ने भी आंदोलन स्थल पर यौन शोषण का आरोप लगाया. कई बार महिला पत्रकारों से भी बदसलूकी का मामला सामने आ चुका है.

ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसानों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन में अराजकता हावी हो रही है? क्या आंदोलनकारी के भेष में यहां उपद्रवी घुस आए हैं. क्योंकि कभी किसान आंदोलन के नाम पर सड़क पर अराजकता दिखती है. तो कभी किसी को जिंदा जला कर मारने का आरोप लगता है. आखिर आंदोलन का ये कैसा तरीका है? सवाल ये भी उठ रहे हैं कि आखिर तीन कृषि कानून के नाम पर शुरू हुए आंदोलन में ये सब क्या और क्यों हो रहा है? क्या ये आंदोलन पूरी तरह पटरी से उतर गया है? या फिर इस आंदोलन को मुट्ठी भर लोगों ने हाईजैक कर लिया है, जो सिर्फ अपनी राजनीति चमकाते रहना चाहते हैं और कुछ लोग अपने एजेंडे को हवा देते रहना चाहते हैं. किसान आंदोलन के नाम पर अपराध और सियासत देश के लिए खतरनाक है.

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