खुद गोल्ड जीतने का सपना पूरा नहीं कर पाई थी यह ऑस्ट्रेलियाई एथलीट, फिर हमवतन का ‘सारथी’ बन रच दिया इतिहास: Latest News

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कई बार ऐसे मौके आते हैं जब खिलाड़ी खुद तो कामयाबी हासिल नहीं कर पाते लेकिन  किसी ओर की कामयाबी की वजह बन जाते हैं. अकसर हमने इस तरह की कहानी में एक असफल खिलाड़ी को कोच बनकर अपना सपना पूरा करते देखा है. ओलिंपिक में भी ऐसे खिलाड़ियों की भरमार रही है जो बतौर खिलाड़ी कामयाब नहीं रहे लेकिन एक कोच के तौर पर उन्होंने देश को कई मेडल दिलाए. हालांकि किस्से ओलिंपिक में आज उनकी कहानी नहीं बताएंगे. आज कहानी बताएंगे उस खिलाड़ी की जिसने एक कोच नहीं एक सारथी बनकर देश को गोल्ड मेडल दिलाया.

यह कहानी है ऑस्ट्रेलिया की मिशेली जोन्स (Michellie Jones) की. मिशेली ऑस्ट्रेलिया की ट्रायथलॉन की दिग्गज खिलाड़ी थीं. उन्होंने 1990 से इस इवेंट में अपने देश का प्रतिनिधित्व करना शुरू किया. उन्होंने 1992 और 1993 में वर्ल्ड चैंपियनशिप भी जीती. वहीं 1998 और 1999 में ट्रायथलॉन वर्ल्ड कप में भी गोल्ड मेडल जीता. उन्होंने सिडनी ओलिंपिक में अपने देश के लोगों के सामने ही सिल्वर मेडल भी जीता.

मिशेली ने दिया कैली का साथ

मिशेली का सपना था कि वह अपने देश के लिए गोल्ड मेडल जीते. हालांकि सिडनी में यह सपना पूरा नहीं हुआ. हालांकि उनके हाथों ऑस्ट्रेलिया को गोल्ड हासिल होना था और वह हुआ भी. दरअसल मिशेली को कैथलीन मारगेट (कैली कैटी) ने पैरालिंपिक के लिए अपना गाइड चुना था. कैथलीन को अशर सिंड्रोम नाम की बीमारी थी. इस बीमारी की वजह से साल 2015 में उनके आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई. आंखों की रोशनी जाने से पहले मैराथॉन दौड़ा करती थीं और कई आयरनमैन इवेंट्स में हिस्सा लेती थीं. जब उनकी आंखो की रोशनी चली गई तो उन्होंने पैरालिंपिक एसोसिएशन से अपने पैरा ट्रायथलॉन में हिस्सा लेने की बात की और वह इसके लिए क्वालिफाई कर गईं. इसके बाद से ही उन्होंने पीटी5 कैटेगरी में हिस्सा लेना शुरू किया.

ट्रायथलॉन में चैंपियन बनी कैली-जोन्स की जोड़ी

इस कैटेगरी के खिलाड़ियों को अपने साथ एक गाइड रखना होता है जो उन्हें रास्ता बताता है औऱ साथ-साथ दौड़ता है. कैली ने जोन्स को चुना जो इसके लिए तैयार हो गई. दोनों ने 2015 में ही वर्ल्ड चैंपियनशिप अपने नाम की. फैंस को और देश को इस जोड़ी से गोल्ड की उम्मीद थी और वह उन्होंने पूरी की. दोनों ने 2016 के रियो पैरालिंपिक में ट्रायथलॉन में गोल्ड मेडल जीता. इस इवेंट ऑस्ट्रेलिया का यह पहला गोल्ड मेडल था. इसके अगले ही साल उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप टाइटल फिर से जीता. ओलिंपिक मेडल को लेकर अपनी जीत की खुशी जाहिर करते हुए जोन्स ने कहा था, ‘मेरे लिए यह बहुत खास है. मेरे सिडनी मेडल से भी बेहतर. कैटी ने अपनी जिंदगी में जो कुछ सहा उसके बाद भी उसका जज्बा कमाल का है. उसके गोल्ड मेडल के सपने को पूरा करने में मै अपना योगदान देकर बहुत खुश हूं. मैंने जिंदगी में इससे अच्छा कोई काम नहीं किया. है. कैली ने साबित किया है कि आपकी कमजोरी आपकी परिभाषा नहीं है जो आप करते हैं वह आपकी परिभाषा है.’

1960 से आयोजित हो रहे हैं रोम ओलिंपिक

1948 और 1952 में युद्ध लड़ने वाले पुराने सैनिकों के लिए स्टोक मैंडविले गेम्स आयोजन के बाद 1960 में रोम में पहली बार पैरालिपिंक्स गेम्स आयोजित किए गए थे. रोम में पहली बार हुए पैरालिंपिक गेम्स में 18 देशों के 209 एथलीटों की भागीदारी रही लेकिन भारत ने 1960 और 1964 के आयोजन में हिस्सा नहीं लिया. पैरालिंपिक में भारत यात्रा 1968 गेम्स से शुरू हुई. भारत ने 1968 में इजरायल के तेल अवीव में पैरालिंपिक में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराई. भारत की ओर से 10 एथलीट्स का दल भेजा गया था, जिनमें आठ पुरुष और दो महिलाएं शामिल थीं. हालांकि, भारत इस आयोजन से खाली हाथ लौटा, लेकिन बड़े मंच पर प्रदर्शन करना भारत के पैरा-एथलीटों के लिए पहला अनुभव था. 1976 और 1980 को छोड़कर भारत ने इसके सभी संस्करणों में भाग लिया 2016 रियो पैरालिंपिक खेलों में भारत ने चार पदक पर कब्जा जमाया, जो 1984 में आयोजित इस आयोजन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाडियों के बराबर था.

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PRAJA PARKHI: खुद गोल्ड जीतने का सपना पूरा नहीं कर पाई थी यह ऑस्ट्रेलियाई एथलीट, फिर हमवतन का ‘सारथी’ बन रच दिया इतिहास: Latest News
खुद गोल्ड जीतने का सपना पूरा नहीं कर पाई थी यह ऑस्ट्रेलियाई एथलीट, फिर हमवतन का ‘सारथी’ बन रच दिया इतिहास: Latest News
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