Birthday Special : हास्य रस में ढूबी होती थीं शैल चतुर्वेदी की कविताएं, अभिनय-संगीत में भी आजमाया हाथ: Latest News

Shail Chaturvedi

शैल चतुर्वेदी (Shail Chaturvedi) उन हस्तियों में से थे, जिन्होंने न केवल अपनी कविताओं से लोगों को गुदगुदाया, बल्कि अपने अभिनय से भी दर्शकों का खूब मनोरंजन किया. आज शैल चतुर्वेदी की जयंती है. शैल चतुर्वेदी का जन्म 29 जून, 1936 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ था. वह पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाया करते थे. इसी दौरान उन्होंने छोटे-छोटे कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेना शुरू किया. दिलचस्पी इतनी बढ़ी कि उन्होंने फिर इस लाइन में अपना करियर बना लिया.

चाहे छोटा पर्दा हो या बड़ा, शैल चतुर्वेदी ने लोगों को अपने अभिनय ने से खूब हंसाया है. 1993 में आया शो जबान संभालके तो आपको याद ही होगा. शैल चतुर्वेदी ने इस शो में स्कूल इंस्पेक्टर की भूमिका निभाई थी, जिसे देखते ही क्लासरूम शोर मचाना बंद कर देती थी और उसके जाते ही पीछे से उसका मजाक उड़ाया जाता था. इसके बाद श्रीमान-श्रीमती में केशव का बॉस बबलू प्रसाद शर्मा, जो उसे हमेशा किसी न किसी बात पर डांटता रहता था.

आखिरी दिनों में दर्द से जूझते रहे, लेकिन चेहरे से मुस्कान नहीं गई

इन जैसे कई किरदारों से शैल चतुर्वेदी ने टीवी की ऑडियंस को तो खूब हंसाया ही, लेकिन साथ ही साथ फिल्मी पर्दे पर भी लोगों का मनोरंजन करने से नहीं चूके. शैल चतुर्वेदी ने उपहार, पायल की झंकार, हम दो हमारे दो, चमेली की शादी, जवानी जिंदाबाद, घर जमाई, धनवान, करीब और तिरछी टोपीवाले जैसी कई फिल्मों में काम किया. कुछ फिल्मों में उन्होंने दर्शकों को गुदगुदाया तो कुछ में वह काफी गंभीर भूमिका में नजर आए. फिल्मों में भले ही उनका छोटा सा रोल रहा हो, लेकिन अपने स्क्रीन प्रेजेंस से उन्होंने लोगों के दिल में अपनी पहचान बनाई.

शैल चतुर्वेदी की असली पहचान थीं उनकी कविताएं, जो हास्य रस और व्यंगों से भरपूर होती थीं. अपने आखिरी दिनों में खुद दर्द से जूझते रहते थे, लेकिन फिर भी चेहरे पर एक मुस्कान रहती. अपनी जिंदगी में उन्होंने कभी हार नहीं मानना नहीं सीखा था. उन्हें डायबिटीज थी. इसके चलते उनके पैर और शरीर के अन्य भागों में अक्सर परेशानी रहती थी. पर शैल चतुर्वेदी ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने आखिरी सांस लेने तक लोगों को अपनी कविताओं और बातों से खूब हंसाया. 29 अक्टूबर, 2007 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

पढ़िए शैल चतुर्वेदी की बेहतरीन कविता ‘चल गई’

वैसे तो एक शरीफ इंसान हूं
आप ही की तरह श्रीमान हूं
मगर अपनी आंख से
बहुत परेशान हूं
अपने आप चलती है
लोग समझते हैं चलाई गई है
जान-बूझकर मिलाई गई है.

एक बार बचपन में
शायद सन पचपन में
क्लास में एक लड़की बैठी थी पास में
नाम था सुरेखा
उसने हमें देखा और बांई चल गई
लड़की हाय-हाय क्लास छोड़ बाहर निकल गई.

थोड़ी देर बाद
हमें है याद, प्रिंसिपल ने बुलाया
लंबा-चौड़ा लेक्चर पिलाया
हमने कहा कि जी भूल हो गई
वो बोले- ऐसा भी होता है भूल में
शर्म नहीं आती, ऐसी गंदी हरकतें करते हो,
स्कूल में?
और इससे पहले कि
हकीकत बयान करते कि फिर चल गई
प्रिंसिपल को खल गई

हुआ यह परिणाम, कट गया नाम
बमुश्किल तमाम, मिला एक काम

इंटरव्यू में, खड़े थे क्यू में
एक लड़की थी सामने अड़ी
अचानक मुड़ी, नजर उसकी हम पर पड़ी
और आंख चल गई, लड़की उछल गई
दूसरे उम्मीदवार चौंके
उस लडकी की साइड लेकर
हम पर भौंके
फिर क्या था
मार-मार जूते-चप्पल
फोड़ दिया बक्कल
सिर पर पांव रखकर भागे
लोग-बाग पीछे, हम आगे
घबराहट में घुस गये एक घर में
भयंकर पीड़ा थी सिर में
बुरी तरह हांफ रहे थे
मारे डर के कांप रहे थे
तभी पूछा उस गृहणी ने – कौन ?
हम खड़े रहे मौन
वो बोली – बताते हो या किसी को बुलाऊं ?
और उससे पहले कि जबान हिलाऊं
चल गई
वह मारे गुस्से के
जल गई

साक्षात दुर्गा-सी दीखी
बुरी तरह चीखी
बात की बात में जुड़ गये अड़ोसी-पड़ोसी
मौसा-मौसी
भतीजे-मामा
मच गया हंगामा
चड्डी बना दिया हमारा पजामा
बनियान बन गया कुर्ता
मार-मार बना दिया भुरता
हम चीखते रहे
और पीटने वाले
हमें पीटते रहे
भगवान जाने कब तक
निकालते रहे रोष
और जब हमें आया होश
तो देखा अस्पताल में पड़े थे
डाक्टर और नर्स घेरे खड़े थे
हमने अपनी एक आंख खोली
तो एक नर्स बोली
दर्द कहां है?
हम कहां कहां बताते
और इससे पहले कि कुछ कह पाते
चल गई
नर्स कुछ नहीं बोली
बाइ गॉड ! (चल गई)
मगर डाक्टर को खल गई
बोला
इतने सीरियस हो
फिर भी ऐसी हरकत कर लेते हो
इस हाल में शर्म नहीं आती
मोहब्बत करते हुए
अस्पताल में?
उन सबके जाते ही आया वार्ड-बॉय
देने लगा अपनी राय
भाग जाएं चुपचाप
नहीं जानते आप
बढ़ गई है बात
डाक्टर को गड़ गई है
केस आपका बिगड़वा देगा
न हुआ तो मरा बताकर
जिंदा ही गड़वा देगा.
तब अंधेरे में आंखें मूंदकर
खिड़की से कूदकर भाग आए
जान बची तो लाखों पाये.

एक दिन सकारे
बाप जी हमारे
बोले हमसे
अब क्या कहें तुमसे ?
कुछ नहीं कर सकते
तो शादी कर लो
लड़की देख लो.
मैंने देख ली है
जरा हेल्थ की कच्ची है
बच्ची है, फिर भी अच्छी है
जैसी भी, आखिर लड़की है
बड़े घर की है, फिर बेटा
यहां भी तो कड़की है.
हमने कहा
जी अभी क्या जल्दी है?
वे बोले
गधे हो
ढाई मन के हो गये
मगर बाप के सीने पर लदे हो
वह घर फंस गया तो संभल जाओगे.

तब एक दिन भगवान से मिल के
धड़कता दिल ले
पहुंच गए रुड़की, देखने लड़की
शायद हमारी होने वाली सास
बैठी थी हमारे पास
बोली
यात्रा में तकलीफ तो नहीं हुई
और आंख मुई चल गई
वे समझी कि मचल गई
बोली
लड़की तो अंदर है
मैं लड़की की मां हूं
लड़की को बुलाऊं
और इससे पहले कि मैं जुबान हिलाऊं
आंख चल गई दुबारा
उन्होंने किसी का नाम ले पुकारा
झटके से खड़ी हो गईं
हम जैसे गए थे लौट आए
घर पहुंचे मुंह लटकाए
पिता जी बोले
अब क्या फायदा
मुंह लटकाने से
आग लगे ऐसी जवानी में
डूब मरो चुल्लू भर पानी में
नहीं डूब सकते तो आंखें फोड़ लो
नहीं फोड़ सकते हमसे नाता ही तोड़ लो
जब भी कहीं जाते हो
पिटकर ही आते हो
भगवान जाने कैसे चलाते हो?

अब आप ही बताइये
क्या करूं?
कहां जाऊं?
कहां तक गुन गांऊं अपनी इस आंख के
कमबख्त जूते खिलवाएगी
लाख-दो-लाख के.
अब आप ही संभालिये
मेरा मतलब है कि कोई रास्ता निकालिये
जवान हो या वृद्धा पूरी हो या अद्धा
केवल एक लड़की
जिसकी एक आंख चलती हो
पता लगाइये
और मिल जाये तो
हमारे आदरणीय ‘काका’ जी को बताइये.

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PRAJA PARKHI: Birthday Special : हास्य रस में ढूबी होती थीं शैल चतुर्वेदी की कविताएं, अभिनय-संगीत में भी आजमाया हाथ: Latest News
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