दिल बेचारा: एक अधूरी समीक्षा                                   -

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा है,


        हम ही सो गए दास्ताँ कहते-कहते”


     छोटे शहर की तंग गलियों से निकल कर,देश की माया-नगरी पर छा जाने की,सुशांत की कहानी मिसाल बनी ही थी कि वो हमें अलविदा कह गए।उनके जाने के बाद इस फ़िल्म का आना,ऐसा है जैसे वो जाने से पहले सबके लिए कुछ कह के गए हैं।फ़िल्म में जब वो मरने से पहले अपना फ्यूनरल देखते हैं तो आश्चर्यजनक रूप से “रील” और “रियल” के बीच का भेद जैसे मिट ही जाता है।
     “दिल बेचारा” JOHN GREEN के novel “THE FAULT IN OUR STARS” पर आधारित है,जिसमें
किज़ी बासु(संजना) thyroid cancer से ग्रस्त होकर,जीवन में पूर्णतः नैराश्य से भर चुकी हैं।ऐसे में उनके जीवन में आते हैं- Immanuel Rajkumar Junior उर्फ़ Manny(सुशांत) जो ख़ुद
Osteosarcoma से पीड़ित हैं पर किज़ी को जीवन के प्रति सकारात्मकता से भर देते हैं ।दोनों अपनी जानलेवा बीमारी में कैसे एक दूसरे का सहारा बनते हैं यहीं फ़िल्म का मूल विषय है।
           ऐसे भावनात्मक विषय पर सधी हुई पटकथा लिखी है-शशांक खेतान ने।शशांक की पटकथा आपको भावनाओं की ऐसी यात्रा पर ले जाती है जिसमें आप किसी बात पर हँस रहे होते हो तो थोड़ी ही देर में आप की आँखों से आँसू झलक जाते हैं।
       
            फ़िल्म का निर्देशन,वर्तमान समय के सबसे सफल कास्टिंग निर्देशक “मुकेश छाबड़ा” ने किया है।निर्देशक के तौर पर यह उनकी पहली फ़िल्म अवश्य है पर ऐसी भावनात्मक कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए जो परिपक्वता चाहिए थी,वो उनके प्रस्तुतीकरण में पूरी तरह नज़र आयी।बॉलीवुड मार्का मेलोड्रामा वाले अतिरेक “से बचने के बाद भी उन्होंने कहानी को पूर्ण मार्मिकता से बयाँ किया है। सुबह-सुबह
की ताज़गी में धुआँ उगलते जमशेदपुर को,जीवन में आती निराशा के प्रतीक के रूप में दिखाना उनकी क्राफ़्ट पर पकड़ को दिखाता है। 
         
          फ़िल्म में संजना,फीमेल लीड एक्ट्रेस के रूप में अपनी पहली फ़िल्म में प्रभावी हैं और उदासीनता के बीच ख़ुशी ढूँढती “किज़ी” के किरदार को वो पूरे  दिल से निभाती नज़र आती हैं।
      फ़िल्म में संगीत ए आर रहमान का है।उन्होंने फ़िल्म की प्रकृति के अनुरूप ही
“बिना शोर वाला भावुक” संगीत रचा है ।
    
            अब बात करते हैं सुशांत की।इस फ़िल्म में उनका अभिनय अकल्पनीय रूप से स्वाभाविक है।फ़िल्म में ऐसा लगा जैसे वो मैनी की मुस्कुराहट और उसके पीछे छुपी हताशा को जी रहे हैं।इस फ़िल्म में उनका अभिनय,अन्य कारणो के अलावा भी, यादगार माना जाएगा।फ़िल्म का वो दृश्य जब वो झूले पर भीगते हुए अपने सपनों के बारे में बात करते हैं तो पता चलता है की सुशांत किस दर्जे के कलाकार थे।
             असल में पूरी फ़िल्म के दौरान,सुशांत को देखते हुए आप एक disbelief में रहते हैं और बार बार ये पूछना चाहते हैं कि-“क्यूँ ?सुशांत क्यूँ?”
  जिसके संघर्ष और सफलता की कहानी लाखों के लिए प्रेरणा है,जिसकी आँखे भविष्य के सपनों से भरी हैं,जिसकी मुस्कान ये भरोसा दिलाती है की ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है,वो “खुद से”,इस ज़िंदगी से मुँह कैसे मोड़ गया??
     सुशांत की इस आख़िरी फ़िल्म की समीक्षा को 
मैं “अधूरी समीक्षा” इसलिए कह रहा हूँ क्यूँकि फ़िल्म देखते में मेरी आँखों का पानी,मुझे फ़िल्म की बारिकियाँ नही देखने दे रहा था।
 
         बेमिसाल कलाकार सुशांत की आख़िरी फ़िल्म को,उसकी मेरिट के आधार पर 
*3.5 STARS* ⭐️⭐️⭐️💥


 सुशांत के लिए-
 “रहने को सदा दहर में आता नही कोई,
तुम जैसे गए,वैसे भी जाता नही कोई”
*सुशांत आप हमेशा याद आओगे*!! -रोमेश


(नोट:उक्त लेख,कॉपीराइट अधि.के तहत संरक्षित है)


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