ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन लेकर वैज्ञानिकों के मन में संशय









































 


कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक इसकी वैक्सीन बनाने में लगे हैं। दुनियाभर के लोगों को एक अच्छी और कारगर वैक्सीन आने का इंतजार है। इस रेस में आगे चल रही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च पर तैयार वैक्सीन से बड़ी उम्मीद है। फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ बनाई गई इस वैक्सीन का उत्पादन भारतीय कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट भी करेगी। दूसरी ओर चीन की भी एक वैक्सीन कामयाबी के बहुत करीब है। ह्यूमन ट्रायल में बेहतर परिणाम देने वाले ये टीके कोरोना से जंग में बहुत उत्साहित करते हैं, लेकिन इसकी सफलता को लेकर वैज्ञानिकों के मन में थोड़ा संशय भी है। 

 


दरअसल, कोरोना महामारी के इस काल में पूरी दुनिया एक आदर्श वैक्सीन का इंतजार कर रही है। चीन की कंपनी 'कैनसिनो बायोलॉजिक्स' और ब्रिटेन की 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी'-'एस्ट्राजेनेका' द्वारा विकसित की गई कोरोना वैक्सीन के शुरुआती नतीजे बेहतर आए हैं। इसे लेकर विशेषज्ञ काफी उत्साहित तो हैं, लेकिन भविष्य की संभावित चुनौतियों और बाधाओं को लेकर चेतावनी भी दे रहे हैं।

 


कोरोना के इस काल में पूरी दुनिया की उम्मीद एक आदर्श वैक्सीन पर टिकी हैं। खबरों के मुताबिक, कोरोना वायरस की उक्त दोनों वैक्सीन शुरुआती ट्रायल में सेफ्टी और इम्यून रेस्पॉन्स के लिहाज से दोनों ही काफी असरदार नजर आ रही हैं। यानी वैक्सीन कोरोना वायरस के खिलाफ शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित भी करती है और यह सुरक्षित भी है। हालांकि ट्रायल के अगले और अंतिम चरण में पता चलेगा कि आखिर यह वैक्सीन इंसानों को संक्रमण से किस हद तक बचा सकती है। 

 


अटलांटा में 'एमोरी यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन' के कार्यकारी सहायक निदेशक डॉ. कार्लोस डेल रियो कहते हैं, 'अगर हम कोई विमान बना रहे हैं तो समझ लीजिए अभी हम उसके प्रोडक्शन लेवल पर हैं। इस स्थिति में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि यह विमान आपको सुरक्षित लैंडिंग करा सकता है लेकिन सवाल ये है कि क्या ये मुझे यहां से पेरिस लेकर जा सकता है। 

 


उन्होंने कहा कि वैक्सीन की खोज में अबतक हम काफी तेजी से आगे बढ़े हैं। जाहिर है कि एक वैक्सीन की जांच और ट्रायल के अलग-अलग चरणों के पूरा होने में सालों लग जाते हैं, लेकिन इस लाखों लोगों की मौत का कारण बने कोरोना महामारी काल में जरूरत ही ऐसी है कि कई देशों में दर्जनों वैक्सीन इतनी जल्दी क्लिनिकल ट्रायल की स्टेज में पहुंच चुके हैं। 

 


ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैनसिनो बायोलॉजिक्स, सेचेनोव यूनिवर्सिटी समेत कई अन्य संस्थानों की वैक्सीन तीसरे चरण के ह्यूमन ट्रायल में पहुंच चुकी हैं। इस चरण में यह देखा जाता है कि क्या ये वैक्सीन वाकई में कोरोना वायरस संक्रमण को खत्म कर सकती है। डेल रिया ने कहा, 'यह सामान्य नहीं है कि किसी वैक्सीन के शुरुआती चरण में अच्छे रिजल्ट देखने को मिले हों। कुछ वैक्सीन बाद में फेल भी हो जाती है। 

 


डेल रिया एचआईवी का उदाहरण दिया। कहा कि ऐसी कई वैक्सीन हैं जो इस संक्रमण की स्थिति में इम्यूनिटी को बढ़ाने में कारगर सिद्ध होती है, लेकिन लेकिन तीसरे चरण में जाते ही यह इंसानों को नहीं बचा पातीं और इसके बाद भी संक्रमण की रिपोर्ट पॉजिटिव ही आती है। 

 


ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन ने इंसान के शरीर में एंटीबॉडी और टी सेल्स दोनों का निर्माण किया है, जो वायरस के सेल्स को खोजकर उन्हें खत्म कर सकते हैं। ब्रिटेन के अलावा ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में भी हुए क्लीनिकल ट्रायल में इस वैक्सीन के बेहतर नतीजे आए हैं। वहीं ब्राजील में हुए चीनी कंपनी कैनसिनो की वैक्सीन के नतीजे भी कुछ ऐसे ही हैं। हालांकि अब यह देखना जरूरी है कि दुनिया की विविधता भरी आबादी पर कौन सी वैक्सीन ज्यादा कारगर साबित होती है। 

 


डेल रियो का कहना है कि धरती पर इस महामारी ने विविधता के आधार लोगों को कम या ज्यादा प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका में बीमारी से ज्यादा प्रभावित हुए लोगों को वैक्सीन के लिए चल रहे रिसर्च में नामांकित होते हुए वह देखना चाहते हैं। उन्होंने ट्रायल में अफ्रीकन अमेरिकन, हिस्पानिक और बुजु्र्गों को भी शामिल किए जाने की जरूरत बताई। कहा कि अगर इसमें सिर्फ मध्यम वर्ग के के गोरे लोगों को ही शामिल किया जाता है तो ऐसी स्टडी का फायदा नहीं है। 

 


अंतिम चरण के ट्रायल के दौरान वैक्सीन के खतरनाक साइड इफेक्ट्स पर भी वैज्ञानिकों की नजर होगी। ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन के ट्रायल के शुरुआती चरणों में बुखार, सिरदर्द जैसे साइड इफेक्ट देखने को मिले हैं। चीन की वैक्सीन के भी कुछ ऐसे ही मामूली साइड इफेक्ट देखे गए, जिन्हें मामूली दवाओं के जरिए दूर किया जा सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफॉर्निया के प्रोफेसर पिन वैंग के मुताबिक, चूंकि यह वायरस एकदम नया है, इसलिए इसकी वैक्सीन बनाना भी काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है।

 












कोरोना वायरस पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। विश्व के 200 से ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले चुका यह वायरस आखिर आया कहां से, इसको लेकर शुरुआत से अबतक कई विरोधाभासी रिपोर्ट सामने आ चुकी है। शुरुआत में आई कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया गया था कि यह वायरस चीन के वेट मार्केट यानी मीट के बाजार से फैला है। वहीं, कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि यह चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालांकि चीन की आपत्ति के बावजूद दुनिया इस बात पर सहमत है कि यह वायरस चीन में ही जन्मा है। लेकिन इटली की एक नई स्टडी में कहा जा रहा है कि वहां कोरोना वायरस के शुरुआती मामले चीन से नहीं, बल्कि कहीं और से आए थे। 

 



इटली की मिलान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कार्लो फेडेरिको पेर्नो की अगुवाई में की गई इस रिसर्च स्टडी में वायरस के स्ट्रेन के बारे में नई जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च स्टडी में फरवरी और अप्रैल महीने के बीच लोम्बार्डी क्षेत्र के 300 से अधिक कोरोना मरीजों के ब्लड सैंपल जमा किए और उनके जीन में हुए बदलाव से वायरल स्ट्रेन की उत्पत्ति का पता लगाया।

 


कोरोना फैलने की आशंका पर चीन की यात्रा पर प्रतिबंध लगाने और वहां की सभी उड़ानों पर रोक लगाने वाला इटली पहला देश था। लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार ब्लड सैंपल वाले मरीजों के जीनोम सिक्वेंस से पता चला है कि कोरोना वायरस के प्रसार में चीन सीधे तौर पर श्रृंखला में शामिल नहीं था।

 




शोधकर्ताओं का कहना है कि 20 फरवरी को लोम्बार्डी के स्वास्थ्य अधिकारियों ने स्थानीय संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि की थी, लेकिन सामुदायिक प्रसार की शुरुआत इससे पहले ही हो चुकी थी। मालूम हो कि इटली का समृद्ध क्षेत्र लोम्बार्डी कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली जगहों में से एक है।


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