बीमार ढांचा, फर्जी दावे और बढ़ता संक्रमण

         कोरोना के बढ़ते संक्रमण ने जहां एक ओर देश के स्वास्थ्य ढांचे की पोल खोलकर रख दी है, वहीं सरकारों की कागजी कार्यवाहियों को भी उजागर किया है। कोरोना के उपचार में लापरवाही बरते जाने के मामले भी सामने आए हैं और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी काफी कड़ शब्दों में एक तरह से सरकार को फटकार भी लगाई है। इसके बाद भी व्यवस्थाओं में बहुत सुधार होता नहीं दिखाई दे रहा है। देश भर में कोरोना रोगियों के उपचार में हो रही घोर लापरवाही का मामला सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान में लिया और बेहद कठोर शब्दों में अपना क्षोभ व्यक्त किया। यह बहुत हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि हालात वास्तव में बहुत खराब होते जा रहे हैं। लगता है मानो सरकारी स्वास्थ्य ढांचा चरमराकर टूटने ही वाला है, जबकि पिछले दो माह में कथित तौर पर अरबों रुपए इस ढांचे को खड़ा रखने और व्यवस्थाएं बढ़ाने में खर्च किए जा चुके हैं। ििवडंबना यह है कि सरकारी अस्पतालों का सबसे बुरा हाल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में देखने को मिल रहा है। अब यदि देश के इन प्रमुखतम शहरों में स्वास्थ्य ढांचे का इतना बुरा हाल है तो फिर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अन्य शहरों में हालात कितने दयनीय होंगे। वैसे, देश के तमाम शहरों के सरकारी अस्पतालों के खराब और डरावने हालात को बयान करने वाली खबरों का सिलसिला थम नहीं रहा है। ऐसी खबरें देश की बदनामी का कारण भी बन रही हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जब इसका अंदेशा फरवरी में ही गया था कि कोरोना वायरस से बड़ी संख्या में लोग सक्रमित हो सकते हैं और उनके उपचार के लिए अस्पतालों में बड़ी संख्या में बेड के साथ अन्य संसाधनों की आवश्यकता होगी, फिर राज्य सरकारें युद्धस्तर पर जुटकर पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं कर सकीं? शायद समुचित व्यवस्था बनाने के बजाय ज्यादा ध्यान बड़े-बड़े दावे करने में दिया कि हम दुनिया के बेहतर देशों में शामिल हैं, हमने शुरुआती दौर में ही संक्रमण बढऩे नहीं दिया। और भी बहुत कुछ। परंतु लाक डाउन खुलते ही तमाम दावों और व्यवस्थाओं की पोल खुल गई है। आज यह देखने-सुनने को मिल रहा है कि कहीं कोरोना मरीजों को भर्ती करने से इन्कार किया जा रहा है, कहीं भर्ती के बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जा रहा है और कहीं-कहीं तो उनके शवों को कचरे वाले वाहनों में ले जाया जा रहा है। यह अकल्पनीय भी है और अक्षम्य भी। दिल्ली में तो यह सामने आया कि कोरोना मरीजों का पता लगाने के लिए होने वाले टेस्ट बढ़ाने के बजाय कम कर दिए गए, उससे तो यही प्रकट होता है कि जान-बूझकर मरीजों की संख्या कम दिखाने की चाल चली गई। यह केवल छल ही नहीं, लोगों के स्वास्थ्य से किया जाने वाला खुला खिलवाड़ भी है। आखिर ऐसे लापरवाही भरे रवैये से कोरोना के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई को कैसे जीता जा सकता है? सरकारों ने जहां एक ओर सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं को बढ़ाने में औपचारिकता निभाई, वहीं निजी अस्पतालों को भरपूर आब्लाइज किया। मध्यप्रदेश का ही उदाहरण लें तो यहां भी सरकारी अस्पतालों की हालत आज भी नहीं सुधर सकी है, जबकि निजी अस्पतालों में कोरोना के मरीज बड़ी संख्या में ठीक होकर निकलने का प्रचार पूरी सरकार कर रही है। कई बार तो ऐसा लग रहा है, मानो वास्तविक मरीज सरकारी अस्पतालों में भेजे जा रहे हैं, और जो कम संक्रमित हैं या संक्रमित हैं ही नहीं, उनके पाजिटिव होने की फर्जी जांच रिपोर्ट बनाकर उन्हें ठीक करने का प्रमाण पत्र दिया जा रहा है। उन अस्पतालों के करोड़ों के बिल स्वास्थ्य विभाग से पास कराए जा रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों में सेनेटाइजर तक पर्याप्त मात्रा में नहीं आ पा रहा है। पीपीई किट के लिए रोना है। जांच के लिए सैम्पल लेने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। दावा किया जा रहा है कि इतने लाख बैड बनवा रहे हैं। हजारों की संख्या में वेंटिलेटर बनकर आ रहे हैं...आदि-इत्यादि। परंतु अस्पताल जाकर देखो, तो कमोबेश वही व्यवस्था। सामान्य जांच तो तत्काल कर दी जाती है, कोरोना का विशेष टैस्ट कई बार दो या तीन दिन बाद किया जाता है। वह भी सैम्पल लेकर भेज दिया जाता है और जांच रिपोर्ट तीन दिन बाद आती है, तब तक मरीज वेंटीलेटर पर पहुंच जाता है। अधिकांश मौतें इसी कारण हुई बताई जा रही हैं। ्रमध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बात करें तो यहां पिछले एक सप्ताह से लगातार रोगियों की संख्या बढ़ रही है। कोटरा सुल्तानाबाद, जहांगीराबाद, शाहजहांनाबाद बड़े प्रभावित क्षेत्र हो गए हैं, लेकिन अभी भी न तो उन क्षेत्रों को सही तरह से सेनेटाइज किया जा रहा है। कोटरा सुल्तानाबाद में दो दर्जन से ज्यादा पाजिटिव एक ही क्षेत्र से निकले, लेकिन उसके पांच सौ मीटर के दायरे में तक में लोगों के सैम्पल नहीं लिए जा सके। और जिस रोगी की मौत हुई, उसके संक्रमित बेटे को ही अस्पताल में भर्ती होने के लिए करीब सोलह घंटे इंतजार करना पड़ा। कुल मिलाकर देश के अधिकांश राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदतर हालत सामने है, दावों की पोल खुल चुकी है। न कहीं बैड बढ़े हैं और न ही पर्याप्त दवाएं हैं। हां निजी अस्पतालों को उपकृत करने का पूरा तंत्र विकसित अवश्य हो गया है, लेकिन वो मरीज से भी कुछ राशि वसूल रहे हैं और सरकार तो प्रति मरीज इलाज का पैसा आयुष्मान योजना से दे ही रही है। सरकारी अस्पतालों के लिए जो फंड स्वीकृत होता है, उसका कितना प्रतिशत वास्तव में सुविधाओं पर खर्च होता है और उसमें भी कितना समय लगता है, इस कोरोना संक्रमण के दौर में भी सामने आ चुका है। यह बेरहमी ही नहीं बेशर्मी भी है...परंतु कुछ कर भी नहीं सकते। जो जनता भुगत रही है, वही या तो वोटों के बदले बिक जाती है या भावनाओं में बह जाती है। -


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PRAJA PARKHI: बीमार ढांचा, फर्जी दावे और बढ़ता संक्रमण
बीमार ढांचा, फर्जी दावे और बढ़ता संक्रमण
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