मध्यम वर्ग का दर्द-कौन हमदर्द पथरीली जमीन पर हरियाली के सपने.

संजय सक्सेना ( दैनिक सांध्यप्रकाश के संपादक )


         प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीस लाख करोड़ का राहत पैकेज देश को दिया है। रिजर्व बैंक इधर ब्याज कम कर रही है और ईएमआई जमा करने पर राहत दे रही है। सब कुछ ठीक है, लेकिन क्या सरकारी तंत्र या कोई अर्थ विशेषज्ञ इस सवाल का जवाब दे सकता है कि छह महीने की इक_ी ईएमआई अर्थात किश्त व्यक्ति देगा कहां से? और कम ब्याज वाला कर्ज मिलेगा कैसे, देगा कौन? बोलने में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और उनके अनुवादक अनुराग ठाकुर, बड़ी सहजता से बोल रहे हैं कि हम आपको हर तरह की मदद देंगे। कर्ज लो और अपना काम चलाओ, नया काम शुरू करो। कर्ज लो, आत्मनिर्भर बनो। उनकी भावना अच्छी हो सकती है। लेकिन क्या यह व्यावहारिक है? बैंकों से किसे और कैसे कर्ज मिलता है, आम आदमी से पूछो। जिसे कर्ज के लिए रिश्वत और कमीशन दोनों देने पड़ते हैं, उससे पूछो। आश्वासन के बाद भी कर्ज न मिलने पर जिसकी एडवांस की रकम डूबती है, उससे पूछो। उससे पूछो, जिसका व्यवसाय सुनते ही बैंक लाल झंडी दिखा देते हैं। कुछ लोगों को यह बात गलत लग सकती है, कुछ तो मैदान में ही उतर आएंगे, लेकिन हमारी मंशा कतई और कतई सरकार की नीयत या इच्छा शक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगाने की नहीं है। हम तो केवल सवाल उठा रहे हैं। पिच्चानबे प्रतिशत लोगों के व्यापार दो माह से बंद हैं। आधे से अधिक लोगों की नौकरियां या तो जा चुकी हैं, या उन्हें लाक डाउन अवधि का वेतन नहीं मिलना। जिनकी नौकरी बची है, वो क्या अगले छह माह तक कर्ज की ताजा और पुरानी किश्त मिलाकर दे पाएंगे? आज खाने को नहीं है, तो अचानक कर्ज अदा करने के पैसे आएंगे कहां से? ईएमआई कम की है, अच्छी बात है। लेकिन देना तो पड़ेगी, उसके पैसे हैं कहां आम आदमी के पास? यह समस्या मजदूरों की नहीं, उस मध्यम वर्ग की है, जिसे सरकारें मुफ्त राशन नहीं देतीं। जिसके खाते में जनधन योजना का पैसा नहीं आता। जिसे गैस सिलेंडर पर अनुदान नहीं मिल रहा। जिसे नौकरी रखने वाला सीधे धमकी देता है, दो महीने का वेतन नहीं मिलेगा। जितने दिन काम, उसका पैसा मिलेगा, वो भी कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। क्योंकि उसके पास ही अभी व्यवस्था नहीं है। क्या सरकार को यह सच्चाई पता है कि निजी संस्थानों में दस से लेकर पैंतीस प्रतिशत तक वेतन कटौती हो रही है? पैंतीस से लेकर पैसठ प्रतिशत तक स्टाफ कम किया जा रहा है? आप लगे हो कर्ज ले लो। पहले वाला कर्ज चुका नहीं पा रहे हैं, डिफाल्टर हो गए हैं। कई बैंकों और फाइनेंस कंपनियों ने तो बाकायदा पेनाल्टी के नोटिस भी भेज दिए हैं। अब कौन देगा कर्ज? और कौन चुका पाएगा पेनाल्टी, बाकी की ईएमआई? योजनाएं पेश करते समय अच्छी लगती हैं। वाहवाही लूट लेती हैं सरकारें। एक तंत्र विकसित किया जाता है, तो राग दरबारी गाता रहता है। लेकिन फायदा कितने लोगों को मिल पाता है, इसके सही आंकड़े कोई नहीं जानता। हर तीसरा व्यक्ति न तो भगोड़ा अरबपति है, न हजारों करोड़ का व्यापारी। बैंक साफ कहते हैं, आपका पिछला रिकार्ड क्या है? आप कितना टैक्स दे रहे हैं? आपका बैंक स्टेटमेंट कैसा है? भाई कुछ है ही नहीं, तो रिकार्ड कैसा? सरकार कहती है बिना गारंटी के लोन मिलेगा। यहां तो गारंटी देने के बाद भी आसानी से नहीं मिलता, सरकारी बैंकें तो बिल्कुल नहीं देतीं। प्राइवेट सेक्टर में उपभोक्ता लुट जाता है। क्या सरकार किश्तें माफ करवा सकती है? इसमें एक सीमा तय कर दी जाए, जैसे दो लाख तक के कर्ज की किश्तें माफ की जाएंगी। सरकार यह भी बताए कि कितनी बैंकों को लिखित निर्देश और गारंटी दी जा चुकी है, जिसके बदले वो आम आदमी को बिना गारंटी का कर्ज देंगी? बीस लाख करोड़ का पैकेज.. आत्मनिर्भर भारत.. बैंकों की ब्याज-ईएमआई में राहत...आम आदमी की फटी जेब से निकल रही हैं। जेब खाली है और घर भी। हाथ पहले से खाली है। आंखों में कभी उम्मीद की किरणें- तो कभी निराशा का अंधेरा.. यथार्थ की पथरीली जमीन पर योजनाओं और घोषणाओं की हरियाली के सपने...!


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