जनकल्याण को समर्पित राज्यपाल लाल जी टंडन

मध्यप्रदेश के राज्यपाल लाल जी टंडन आज 85 वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। उनके पास सात दशकों की सुदीर्घ समाज सेवा की ठोस पूंजी है। सार्वजनिक जीवन को उन्होंने बड़ी जीवंतता से जीया है और समाज के सभी वर्गों से गहरा तादात्म्य स्थापित किया है। सबको साथ लेकर चलने और अजातशत्रु रहकर समाजहित में कार्य करने की अटूट आत्मशक्ति उनके व्यक्तित्व में समाहित है। निरंतर क्रियाशील रहने के कारण ही आज जन कल्याणकारी कार्यों की बड़ी लम्बी श्रृखंला उनके खाते में है। उन चंद जन नेताओं में उनकी गिनती होती है जिन्होंने राष्ट्र सेवा और नैतिक मूल्यों की साधना राजनीति के माध्यम से की और अन्त्योदय की भारतीय अवधारणा को साकार किया।


जनसंघ की स्थापना के समय से जुड़कर लखनऊ में उसका सर्वप्रमुख चेहरा बन जाने के बाद भी राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के लगभग सभी लोगों से उनके जीवंत संबंध रहे और समाज के सभी वर्गों में टंडन जी का खासा सम्मान रहा। अपनी सहजता, कर्मठता और आत्मीयता से टंडन जी देखते ही देखते लखनऊ के हर कार्यक्रम की धुरी बन गये। कार्यक्रम चाहे साहित्यिक हो, सांस्कृतिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक हो सभी जगह टंडन जी की खोज होने लगी, पूछ होने लगी। विचार-विनिमय के बड़े केंद्र लखनऊ के कॉफी हाउस में होने वाली कोई भी विचारोत्तेजक बहस टंडन जी के बिना अधूरी लगने लगी। अमृतलाल नागर, नारायण चतुर्वेदी, भगवती चरण वर्मा सहित अनेकानेक प्रख्यात साहित्यकार, विद्वान, मनीषियों का सानिध्य और स्नेह पाकर टंडन जी की अध्ययनशीलता और चिंतन क्षमता निरंतर विस्तारित होती गयी।


सार्वजनिक जीवन की ऐसी उदात्त, व्यापक और तपी हुई पृष्ठभूमि के साथ विधान परिषद में जब 1978 में टंडन जी पहुॅंचे तो वहॉं भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी और संसदीय मर्यादाओं को नयी ऊॅंचाइयॉं दी। उत्तरप्रदेश विधान परिषद के दो बार सदस्य रहने के अलावा उन्होंने वहॉँ नेता सदन की भी भूमिका निभायी। विधान सभा के लिए तीन बार चुने गये। वहॉं नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में उन्होंने बताया कि विरोध के स्वर कैसे होने चाहिए और शालीन रहकर भी सरकार को जन-आवाज सुनने के लिए किस प्रकार बाध्य किया जा सकता है। उत्तरप्रदेश के वरिष्ठ मंत्री के रूप में तो टंडन जी का हर कदम प्रगति की एक नयी दास्तान बनता चला गया और नये-नये कीर्तिमान रचे जाने लगे। पांच बार मंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के साथ उन्होंने उर्जा, आवास, नगर विकास, जल संसाधन जैसे भारी भरकम विभाग संभाले। अपने प्रशासनिक कौशल, दूरदृष्टि और दृढ़संकल्प से टंडन जी ने उत्तरप्रदेश के करोड़ों नागरिकों को सीधा लाभ पहुंचाया। इन विभागों की दशा और दिशा बदल दी। उस समय के सुधारों और बदलावों को आज भी याद किया जाता है। अन्त्योदय की भारतीय अवधारणा को साकार करने के लिए दबे-कुचले और वंचित वर्ग के लिए उस समय जो योजनाएं टंडन जी के नेतृत्व में बनायी गयीं, वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हुईं। पॉंच रूपये, दस रूपये और पंद्रह रूपये रोज पर दबे-कुचले तबके को मकान का मालिकाना हक दिलाने की स्वप्निल योजना साकार हुई। आवास के साथ एक फलदार वृक्ष और एक दुधारू पशु देने की यह योजना टंडन जी की बहुआयामी सोच की साबनी। गरीबी-उन्मूलन के लिए बड़े पैमाने पर जमीनी कार्य हुए। सामुदायिक केंद्र बने, रैन बसेरे बने, मलिन बस्तियों का कायाकल्प हुआ। मथुरा-वृंदावन की खारे पानी की बड़ी समस्या का समाधान हुआ। गढ़मुक्तेश्वर सहित प्रदेश के तमाम नगरों का कायाकल्प हो गया। विकास प्राधिकरण पहली बार लाभ में आ गये। विकास में किफायतशारी की कला में टंडन जी का कोई जोड़ नहीं रहा।


हर क्षण, हर अवसर, हर उपलब्ध ताकत का इस्तेमाल लोक-कल्याण के लिए करने की उनकी प्रवृति के चलते ही जब उन्हें कुछ समय के लिए अन्य मंत्रालयों का कार्यभार मिला तो उन्होंने वहॉं भी ऐतिहासिक कार्य किये। उत्तरप्रदेश में पहली बार गोवध निषेध अधिनियम बना। हरिद्वार में हरि की पैड़ी पर पॉंच किलोमीटर लंबा घाट जनसहयोग से बनवाना उनकी विलक्षण सोच का नतीजा था। हरिद्वार में कुंभ के लिए इतनी मूलभूत सुविधाओं का विकास उन्होंने करा दिया कि अब वहॉं कुंभ के आयोजन में बहुत कुुछ नहीं करना पड़ता। टंडन जी के खाते में कुंभ के तीन आयोजन कराने की दुर्लभ उपलब्धि है। इसमें प्रयाग कुंभ की सफलता अद्वितीय प्रबंध कौशल की मिसाल बन गयी।


अयोध्या मामलों के प्रभारी के रूप में श्रीराम जन्मभूमि न्यास को 42 एकड़ जमीन सौंपने का काम जिस तत्परता और संकल्पबद्धता से टंडन जी ने कर दिखाया, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती। टंडन जी के जीवन में असंभव को संभव बनाने का सिलसिला कभी थमा नहीं। सन् 2003 में उनके द्वारा एक साथ 1001 योजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास विश्व रिकार्ड के रूप में लिम्का बुक ऑफ रिकाड्र्स में दर्ज किया गया। बकौल प्रख्यात साहित्यकार के.पी. सक्सेना-


लोगों ने उन्हें विकास-पुरूष कहा तो कोई सितारे नहीं जड़ दिये। अभिमन्यु के नाम से पहले वीर जोडऩा अभिमन्यु पर एहसान नहीं, उसका हक है।


लाल जी टंडन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि राजनेता बनने पर भी उन्होंने समाजसेवक के अपने रूप को बनाये रखा। इसीलिए उन्हें साम्प्रदायिक एकता के प्रतीक और मानवता के लाड़ले सपूत के रूप में सदैव देखा गया। इसी छवि के आधार पर उन्होंने लखनऊ में शिया-सुाी संप्रदाय के लंबे समय से चले आ रहे झगड़े को सुलझाने में ऐतिहासिक सफलता पायी। मुस्लिम अभिजनों, धर्मगुरूओं से उनके आत्मीय संबंध रहे। लखनऊ में होली के शालीन जुलूस की प्राचीन परम्परा को टंडन जी ने पुनर्जीवित किया। सार्वजनिक कवि सम्मेलन की परम्परा कायम की और उसमें जीवंतता से हमेशा मौजूद रहे। ख्यालगोई और मुशायरे की परम्परा भी बनायी। जयप्रकाश नारायण के समग्र क्रांति आंदोलन की लखनऊ में कमान संभाली। इमरजेंसी में जेल गये, भारी प्रताडऩा सही। ओजस्वी वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनायी और कभी लिखित भाषण नहीं पढ़ा।


टंडन जी ने अपने जन्मदिन को समाजसेवा और सृजन का त्यौहार बना दिया। श्मशान घाट पर उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया और देखते ही देखते लखनऊ का वह उपेक्षित श्मशान घाट (गुल्लालाघाट) सभी सुविधाओं से युक्त हो गया। एक बार इस अवसर पर गोमती नदी की सफाई का अभियान छिड़ गया। जन्मदिन पर उत्तरांचल के भूकंप पीडि़तों के लिए 10 ट्रक राहत सामग्री भिजवायी गयी, एक बार पॉलीथीन खाने से बीमार पड़ी गायों का ऑपरेशन करवाया गया। टंडन जी को गो-सेवा का जुनून है। उन्होंने स्वयं एक गो-शाला स्थापित की है।


लाल जी टंडन लखनवी तहजीब के प्रतीक-पुरूष माने जाते हैं। लोग कहते हैं कि उन्हें देख लिया तो मानो लखनऊ देख लिया। उनकी मिलनसारिता, लोगों की मदद करने की सहज तत्परता, जमीन से जुड़े रहने की क्षमता और अध्ययनशीलता जैसे गुणों को सभी स्वीकारते हैं। सर्वप्रिय होना उनकी सबसे बड़ी पूंजी है और इसी के बल पर सन् 2009 में विपरीत हवा में भी टंडन जी लखनऊ से सांसद बने और अटल जी की विरासत को विस्तार दिया। जनकल्याण के संकल्प से प्रबल उर्जावान बन टंडन जी ने बढ़ती उम्र के बावजूद 16-16 घंटे काम करने का क्रम सदैव बनाये रखा और किसी पद पर नहीं रहने पर भी प्रतिदिन सैकड़ों लोगों से उनकी मुलाकात का क्रम कभी भंग नहीं हुआ।


पंडित दीनदयाल उपाध्याय और लोहिया जी जैसे प्रखर चिंतक, भारत रत्न नाना जी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी और जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेताओं से टंडन जी के अत्यंत निकट के पारिवारिक संबंध रहे। ऐसे लोगों के दीर्घ सानिध्य से टंडन जी अनुभव समृद्ध बनते चले गये। आज उनमें भारतीय संस्कृति, धर्म, नीति, राष्ट्रप्रेम, मानवता, निष्काम कर्म और वाचस्पत्य विलसित होता है।


यह सौभाग्य है कि ऐसे कर्मयोगी टंडन जी आज मध्यप्रदेश के राज्यपाल हैं और अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य-शक्ति को उन्होंने उच्चशिक्षा क्षेत्र के कायाकल्प के लिए लगा दिया है। इसके सुखद परिणाम भी सामने आने लगे हैं। अभी मध्यप्रदेश में राजनैतिक संकट के समय राज्यपाल के रूप में उनकी भूमिका की सर्वत्र सराहना हुई। कोरोना के आसा संकट की भयावहता को पहले ही समझकर जिस दूरदृष्टि से मध्यप्रदेश के राजभवन ने कमान संभाली और ढ़ीले पड़े प्रशासनिक पेचों को कसा, उसका ही असर रहा कि राजनैतिक उठाापटक के बावजूद कोरोना का कहर नियंत्रण से बाहर नहीं हुआ। लाल जी टंडन जी के भीतर समाज सेवा के सहस़्त्रों दीप प्रज्वलित हैं, जिनका ताप वह स्वयं सह रहे हैं लेकिन प्रकाश जन-जन में बांट रहे हैं। समाज को समर्पित ऐसे लोकसेवक आज दुर्लभ हो चुके हैं।


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