सुख दुख जीवन का अंग है: सुधांशुजी महाराज

भोपाल। भाग्य चक्र बदलता रहता है, सुख दुख आते रहते हैं, हमें इसमें सम रहना चाहिए, यह भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। श्रीकृष्ण के उपदेशों  की व्याख्या करते हुए आचार्य श्री सुधांशु जी ने बताया कि हम कैसे अपने जीवन को कैसे अधिक सुखी बना सकते हैं। विश्व जागृति मिशन भोपाल मंडल द्वारा  लालपरेड मैदान में  चार दिवसीय विराट सत्संग का आयोजन किया गया है। सत्संग के दूसरे दिन महाराजश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि वस्तुएं उपयोग के लिए होती है, इनमें इतना जुड़ाव ना हो कि उनके छूटने पर आप टूट जाएं।  गीता के श्लोकों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि हमें भय रहित होकर जीना चाहिए। सखाभाव और करुणा भाव रखना चाहिए। वस्तुओं से आसक्ति नहीं रखना चाहिए। अहंकार रहित होकर जीवन जीना चाहिए। सुख‌ दुख में संतुलन बनाए रखना चाहिए। जो इन बातों को मानता है, वही भगवान का सबसे प्यारा होता है और उसी का जीवन सार्थक होता है। 
        आचार्य सुधांशु जी ने बताया कि यह संसार व्याकुलता में जी रहा है क्योंकि व्यक्ति जो चाहता है उसे नहीं मिलता ।  इससे उसकी असंतुष्टि बढ़ती है, और इस असंतुष्टि से जीवन में कष्ट बढ़ते रहते हैं। हमारी प्रसन्नता हमारे भीतर है लोग उसे बाहर ढूंढते हैं, जबकि वह हमारे भीतर है। भीतर की प्रसन्नता ही सच्चा आनंद है। आनंद के लिए ध्यान की और ध्यान के लिए गुरु की आवश्यकता है। व्यक्ति को संतुलन बनाकर लगातार अपना कार्य करना होता है तभी सिद्धि मिलती है । हमें  सफलता की कीमत चुकानी होती है, जो कीमत नहीं चुकाते वह सफलता से दूर रहते हैं।


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